सिंगरौली : ऊर्जा का सिरमौर, प्रदूषण और विस्थापन के दर्द के बीच देश को दे रहा उजियारा
सिंगरौली, जिसे ऋषि सिंगी की तपोभूमि माना जाता है, ने अपने इतिहास में कई करवटें बदली हैं। राजाओं के जमाने में जहां इसे काले पानी की सजा के लिए कुख्यात किया जाता था, वहीं आज यही सिंगरौली काले हीरे यानी कोयले की वजह से पूरे देश में पहचान बना चुका है।

काले पानी से काले हीरे तक का सफर
सिंगरौली, जिसे ऋषि सिंगी की तपोभूमि माना जाता है, ने अपने इतिहास में कई करवटें बदली हैं। राजाओं के जमाने में जहां इसे काले पानी की सजा के लिए कुख्यात किया जाता था, वहीं आज यही सिंगरौली काले हीरे यानी कोयले की वजह से पूरे देश में पहचान बना चुका है।
देश की ऊर्जा जरूरतों की रीढ़
सिंगरौली को आज ऊर्जा की राजधानी कहा जाता है। यहां से निकलने वाला कोयला देश के बिजली घरों की सबसे बड़ी ताकत है।
- एनसीएल (Northern Coalfields Limited) की 10 परियोजनाएं यहां संचालित हो रही हैं।
- अकेला सिंगरौली देश की कुल कोयला आपूर्ति में 15% योगदान देता है।
- यहां से निकला कोयला 90% तक सीधे बिजलीघरों को सप्लाई होता है।
10% बिजली उत्पादन का स्रोत
सिंगरौली से होने वाला कोयला उत्पादन देश के कुल बिजली उत्पादन का लगभग 10% कवर करता है। यानी, देश की हर दस बल्बों में से एक की रोशनी सिंगरौली के दम पर है।
राजस्व में बड़ा योगदान
कोयला और बिजली उत्पादन के जरिए सिंगरौली न सिर्फ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि राज्य और केंद्र सरकार की झोली भी राजस्व से भर रहा है।
विकास की कीमत : प्रदूषण और विस्थापन
हालांकि, ऊर्जा उत्पादन की इस चमक के पीछे सिंगरौली का एक काला सच भी है। यहां के लोग प्रदूषण और विस्थापन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।
- कोयला खदानों से निकलने वाली धूल और प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़े हैं।
- हजारों परिवार विकास परियोजनाओं के चलते विस्थापित हो चुके हैं।
सिंगरौली ने देश को रोशन करने के लिए अपने हिस्से की तकलीफें चुपचाप झेली हैं। शायद इसलिए इसे सही मायनों में ऊर्जा का सिरमौर कहा जाता है।













