मऊगंज में शहडोल जैसा फर्जीवाड़ा: 40 मिनट में 10 लाख खर्च, इलेक्ट्रिक दुकान से आई मिठाई
मऊगंज (मध्य प्रदेश) — सरकारी कार्यक्रमों में बेतहाशा खर्च को लेकर मध्य प्रदेश एक बार फिर सुर्खियों में है। शहडोल जिले में 14 किलो ड्राईफ्रूट खाने के विवाद के बाद अब मऊगंज जिले में एक नया फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने सरकारी कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मऊगंज (मध्य प्रदेश) — सरकारी कार्यक्रमों में बेतहाशा खर्च को लेकर मध्य प्रदेश एक बार फिर सुर्खियों में है। शहडोल जिले में 14 किलो ड्राईफ्रूट खाने के विवाद के बाद अब मऊगंज जिले में एक नया फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने सरकारी कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
📍 क्या है मामला?
17 अप्रैल 2025 को जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत मऊगंज जिले में एक सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल की उपस्थिति रही। यह कार्यक्रम कुल 40 मिनट चला, लेकिन इसके खर्चों ने होश उड़ा दिए।
💸 40 मिनट में 10 लाख रुपए का खर्च!
कार्यक्रम की अवधि भले ही 40 मिनट रही, लेकिन इस दौरान कुल 10 लाख रुपए खर्च किए गए। हैरानी की बात यह है कि जिन मदों पर खर्च दिखाया गया, उनमें से कई पूरी तरह संदिग्ध हैं।
🧾 फर्जी बिलिंग के आरोप — मिठाई भी आई इलेक्ट्रिक दुकान से
- एक इलेक्ट्रिक दुकान से मिठाई, गद्दे और चादर मंगाने का बिल लगाया गया।
- खर्चों में अन्य गैर-जरूरी व अवास्तविक सामग्रियों के बिल भी शामिल हैं।
- बिलिंग में भारी हेरफेर और वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं।
📢 शिकायत और जांच का आदेश
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मऊगंज जिले के कलेक्टर अजय कुमार जैन को शिकायत सौंपी गई। उन्होंने मामले की प्राथमिक जांच के आदेश दे दिए हैं।
🧿 पिछला मामला: शहडोल में ड्राईफ्रूट घोटाला
यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब हाल ही में शहडोल जिले में भी एक सरकारी कार्यक्रम में 14 किलो ड्राईफ्रूट खाने का मामला सामने आया था। वहां भी सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि के बाद जांच जारी है।
🗣️ जनता में आक्रोश और सवाल
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने प्रदेश की सरकारी पारदर्शिता और धन के उपयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जनता जानना चाहती है —
➡️ क्या इन मामलों में दोषियों पर कोई कार्रवाई होगी?
➡️ सरकारी योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचेगा या खर्च आयोजनों पर ही होता रहेगा?
📌 निष्कर्ष:
मऊगंज का यह मामला सरकारी खर्चों में पारदर्शिता और जवाबदेही की तत्काल ज़रूरत को उजागर करता है। अब देखना यह होगा कि जांच के बाद हकीकत क्या निकलती है और क्या कोई ठोस कार्रवाई होती है या यह भी शहडोल जैसी फाइलों में दबी एक कहानी बनकर रह जाएगा।













